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स्मृतियों में बसने वाली ही वास्तविक कविताएं: डॉ जसवीर त्यागी

  • अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के तत्वावधान में पंचशील प्राइमरोज में ‘वसंतोत्सव’ का आयोजन
  • दर्जनों कवि, कवयित्रियों , शायरों ने शानदार रचनाएं सुनाकर समां बांधा
    गाजियाबाद
    । दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व सुप्रसिद्ध कवि डॉ. जसवीर त्यागी ने कहा कि हर व्यक्ति स्वभाव से किसी न किसी रुप में कवि होता है ये बात अलग है कि सबकी भाव अभिव्यक्ति र्ह्दय स्पर्शी नहीं होती। उन्होंने कहा कि संक्षिप्त शब्दों में सारगर्भित कविताएं जो हमारे मन व स्मृतियों में बस जाती हैं, वे वास्तविक कविताएं व साहित्य की पूंजी होती हैं।
    डॉ जसवीर त्यागी रविवार शाम को अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के तत्वावधान में यहां पंचशील प्राइमरोज सोसाइटी में आयोजित ‘वसंतोत्सव’ में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। कार्यक्रम में दर्जनों कवि, कवयित्रियों , शायरों ने शानदार रचनाएं सुनाकर समां बांधा। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता की की गाजियाबाद के रचनाकार वर्तनी व शब्दों के सही उच्चारण पर ध्यान दे रहे हैं, जबकि राजधानी समेत अन्य स्थानों के तमाम कविगण भाषायी लिंग दोष से अब तक मुक्त नहीं हो पाए हैं। डॉ जसवीर ने अपनी कई संक्षिप्त कविताएँ सुनाईं। कार्यक्रम की शुरूआत पूजा शर्मा व गरिमा कुमार द्वारा गायी गई सरस्वती वंदना से हुई, जिसकी तबले पर संगत वरदान मेहरा ने की। प्रसिद्ध कवि डॉ चेतन आनंद ने अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। उनके इस शेर को बहुत पसंद किया गया। उन्होंने पढ़ा-
    ‘कभी रहे हम भीड़ में, कभी रहे तन्हाई में,
    सारी उम्र गुजारी हमने रिश्तों की तुरपाई में।’

    दिल्ली से आये शायर सुरेश मेहरा की संगीतमय गजल प्रस्तुति पर श्रोता झूम उठे। उनकी गजल थी-
    मेरी जैसी नहीं आशिकी आपकी, ऐसे कैसे निभेगी मेरी आपकी’।
    कवयित्री निवेदिता शर्मा ने अपनी कविता कुछ यूं पढ़ी- ‘कभी आबाद होता है, कभी बर्बाद होता है, वक़्त के कैद से इंसान कब आजाद होता है।’
    जमशेद माहिर हापुड़ी के इस शेर को सराहा गया-”जान लेता तू जो हमारे कलम की ताकत, अपने हाथों से ये शमशीर औ ढाल शील्ड रख देता।
    सुदामा पाल के अपनी अशआर कुछ यूं पढ़े-
    तरकीब जिनकी चल गयी, फनकार हो गये, उसूलों पर हम चले, कलमकार हो गये।
    अर्श राय बरेलवी ने अपनी गजल पढ़ी-
    इसी गली में हमारा मकान है साहिब, छतें नहीं हैं, खुला आसमान है साहिब, हमें बहशियाने हादसे का डर भी रहता है, हमारे घर में भी बेटी जवान है साहिब।
    वरिष्ठ कवि विष्णु सक्सेना ने अपना प्रेमगीत पढ़ा-
    हर समय यूं अधर खोला नहीं करते, प्यार में हर बात बोला नहीं करते।
    निरंजन त्यागी निशंक’ ने ‘पद’ शीर्षक से राजनीति पर कटाक्ष करती बेहतरीन कविता सुनाई। इनके अलावा हिमानी कश्यप, संजय कुशवाहा, आशुतोष कुमार श्रीवास्तव आदि ने कविता पाठ किया। युवा कवि दीपक मिश्र ने “दादी माँ’ कविता सुनाकर श्रोताओं को उनके मधुर बचपन की याद दिला दी। सुप्रसिद्ध चित्रकार डॉ. लाल रत्नाकार ने अपने वक्तव्य में साहित्य व चित्रकला की पारस्परिक अनुरुपता पर प्रकाश डाला व अपने अनुभव सांझा किये। उन्होंने अपनी नये रंग की प्रतीकात्मक भाव वाली कविताएं भी सुनाई। कार्यक्रम के विशेष अतिथि युवा आलोचक डॉ. नीरज कुमार मिश्रा ने गांव के जीवन व बचपन की भावनाओं की अभिव्यक्ति अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त की। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विपिन त्यागी ने कहा कि कोरोना का प्रकोप कम होने के बाद आफ लाइन साहित्यिक गतिविधियों के शुरू होने से साहित्य सृजन में आया ठहराव खत्म होगा और फिर से हम पूर्व स्वरुप में जीते हुए अपने जीवन व व्यवसायिकता को आगे बढ़ा सकेंगे। अमर भारती के अध्यक्ष डॉ रमेश कुमार भदौरिया ने पत्नी पर आधारित अपनी लोकप्रिय कविता सुनाई और जमकर वाहवाही लूटी। कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ अधिवक्ता व कवि प्रवीण कुमार ने किया। संचालन के साथ ही अपनी कविता ह्य नियंता नहीं हो तुमह्ण से भी श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया।
    कार्यक्रम में अवनीश पाठक, संजय शर्मा, विनीत शर्मा, नीरज गौतम, अजयकांत दूबे, अनुराधा शर्मा, मीनू कुमार, कुमार आर्यन, ऋतु पाठक का भी विषय योगदान रहा।

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